AIJRELPLS Vol 11 Issue 1aerfpublications2026-03-01T10:29:57+00:00
AIJRELPLS VOLUME 11, ISSUE 1 (2026, JAN/FEB) (ISSN-2456-3897)Online
Anveshana’s International Journal of Research in Education, Literature, Psychology and Library Sciences
1.
मिवानी जिला के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता का तुलनात्मक भौगोलिक अध्ययन
अमरजीत लाम्बा & डॉ. तरुण कुमार यादव
Page 1-10
 | Paper Titleमिवानी जिला के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता का तुलनात्मक भौगोलिक अध्ययनAbstractयह शोधपत्र मिवानी जिला के ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों में पेयजल उपलब्धता की स्थिति का तुलनात्मक भौगोलिक विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन का मुख्य उद्देश्य दोनों क्षेत्रों में जल स्रोतों, वितरण प्रणाली, गुणवत्ता, आपूर्ति की नियमितता तथा जनसंख्या घनत्व के प्रभाव का मूल्यांकन करना है। शोध में प्राथमिक एवं द्वितीयक आंकड़ों का उपयोग किया गया है, जिसमें सर्वेक्षण, साक्षात्कार तथा सरकारी अभिलेखों का विश्लेषण शामिल है।
अध्ययन से स्पष्ट होता है कि शहरी क्षेत्रों में पाइपलाइन जलापूर्ति प्रणाली अपेक्षाकृत विकसित है, किन्तु जनसंख्या वृद्धि एवं अवसंरचनात्मक दबाव के कारण जल संकट की स्थिति उत्पन्न हो रही है। इसके विपरीत ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल की उपलब्धता मुख्यतः भूमिगत जल स्रोतों, हैंडपंपों एवं ट्यूबवेलों पर निर्भर है, जहाँ जलस्तर में गिरावट और जल की गुणवत्ता (विशेषतः लवणता एवं फ्लोराइड) की समस्या प्रमुख चुनौतियाँ हैं।
भौगोलिक दृष्टि से जल संसाधनों का असमान वितरण, जल प्रबंधन की नीतियों का प्रभाव तथा सामाजिक-आर्थिक कारक पेयजल उपलब्धता को प्रभावित करते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष जल संसाधन प्रबंधन, सतत विकास और नीति-निर्माण के लिए उपयोगी सुझाव प्रदान करते हैं, जिससे ग्रामीण एवं शहरी क्षेत्रों के बीच जल असमानता को कम किया जा सके। KEYWORDS : मिवानी जिला, पेयजल उपलब्धता, ग्रामीण क्षेत्र, शहरी क्षेत्र, जल संसाधन, भूजल स्तर, जल गुणवत्ता, भौगोलिक विश्लेषण, सतत विकास, जल प्रबंधन
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2.
स्वरोजगार के अवसर और महिला बेरोजगारी: शेखावाटी क्षेत्र के संदर्भ में एक अध्ययन
पूजा प्रजापत & डॉ. शिव कुमार
Page 11-17
 | Paper Titleस्वरोजगार के अवसर और महिला बेरोजगारी: शेखावाटी क्षेत्र के संदर्भ में एक अध्ययनAbstractप्रस्तुत अध्ययन शेखावाटी क्षेत्र के संदर्भ में महिला बेरोजगारी की समस्या तथा स्वरोजगार के उपलब्ध एवं संभावित अवसरों का विश्लेषण करता है। शेखावाटी क्षेत्र सामाजिक-सांस्कृतिक परंपराओं, सीमित औद्योगिक विकास तथा रोजगार के अपर्याप्त साधनों के कारण महिला बेरोजगारी की गंभीर चुनौती से जूझ रहा है। इस अध्ययन का मुख्य उद्देश्य यह समझना है कि स्वरोजगार किस प्रकार महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने, उनकी आय बढ़ाने तथा बेरोजगारी को कम करने में सहायक हो सकता है।
अध्ययन में हस्तशिल्प, कढ़ाई-बुनाई, डेयरी, कृषि-आधारित उद्योग, लघु उद्योग, स्वयं सहायता समूह, डिजिटल एवं घरेलू उद्योग जैसे स्वरोजगार के विभिन्न क्षेत्रों की संभावनाओं का परीक्षण किया गया है। साथ ही महिलाओं के सामने आने वाली प्रमुख बाधाओं—जैसे शिक्षा की कमी, पूंजी का अभाव, सामाजिक प्रतिबंध, प्रशिक्षण और विपणन सुविधाओं की कमी—का भी विश्लेषण किया गया है।
अध्ययन से यह निष्कर्ष निकलता है कि यदि उचित प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता, सरकारी योजनाओं की प्रभावी क्रियान्विति तथा सामाजिक समर्थन उपलब्ध कराया जाए, तो स्वरोजगार शेखावाटी क्षेत्र में महिला बेरोजगारी को कम करने का एक सशक्त माध्यम बन सकता है और महिलाओं के समग्र सामाजिक-आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। KEYWORDS : महिला बेरोजगारी, स्वरोजगार, शेखावाटी क्षेत्र, महिला सशक्तिकरण, कौशल विकास, स्वयं सहायता समूह, ग्रामीण अर्थव्यवस्था
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3.
WESTERNISATION AND FEMALE AGENCY IN THE NOVELS OF INDIAN WOMEN AUTHORS
D. Sunitha & Dr. B. K Rajya Lakshmi
Page 18-24
 | Paper TitleWESTERNISATION AND FEMALE AGENCY IN THE NOVELS OF INDIAN WOMEN AUTHORSAbstractThe nineteen nineties has been the most significant decade for the Indian novels in English as it brought about a number of important changes in literary discourses. From time to time, various scholars and eminent critics of evaluate and interpret the major works of the major writers of this decade such as Anita Desai, Kamala Markandeya, Nayantara Sahgal, Shashi Deshpande, Arundhanthi Roy, Githa Hariharan, Manju Kapur and many other significant names. However, it is clear that Indian feminist movement was meticulously carved by the Indian women novelists as they were highly conscious of the women\'s liberation movement. These novels have a feminist undercurrent, having woman as the central character. These women mostly rebel against the existing social set up and discard the idea of being submissive, suffering and sacrificing. The present paper aims to depict the different representations of women that Indian-English women novelists have depicted in their novels. However, these Indian women novelists innately understood the worries and presented women as someone who fights against the cover-up and abuse of a male-dominated society. The novels of these women novelists express cruelty, pain, and hopelessness they experienced themselves living in a patriarchal culture. Thus, it can be said that their work has shaped the experience of women in Indian English fiction and beyond. Besides this, the diversity in the contextual reality of the third world women is undermined by the Western feminist scholarship. Hence, by recognizing various forms of oppression, it will also seek to legitimize the existence of diverse oppressive experiences in regards to class and gender dynamics in Pakistan. This recognition will eventually serve to render an authentic agency to women. KEYWORDS : Indian women writers, Indian Literature, Indian English Novels, contemporary India
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4.
योग के माध्यम से युवा खिलाड़ियों की मानसिक एकाग्रता एवं तनाव नियंत्रण की भूमिका
बालगोविंद सिंह & डॉ. अखिलेश कुमार सिंह
Page 25-32
 | Paper Titleयोग के माध्यम से युवा खिलाड़ियों की मानसिक एकाग्रता एवं तनाव नियंत्रण की भूमिकाAbstractआज के प्रतिस्पर्धात्मक खेल वातावरण में युवा खिलाड़ियों के लिए मानसिक एकाग्रता और तनाव नियंत्रण अत्यंत महत्वपूर्ण कारक हैं। खेल प्रदर्शन केवल शारीरिक क्षमता पर निर्भर नहीं करता, बल्कि मानसिक स्थिति और मनोवैज्ञानिक स्थिरता भी सफलता में निर्णायक भूमिका निभाती है। योग, प्राचीन भारतीय अभ्यास, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक संतुलन को बढ़ाने में प्रभावी माना जाता है। इस अध्ययन का उद्देश्य युवा खिलाड़ियों में योगाभ्यास के माध्यम से मानसिक एकाग्रता और तनाव नियंत्रण पर पड़ने वाले प्रभाव का मूल्यांकन करना है। अध्ययन में विभिन्न योग तकनीकों जैसे प्राणायाम, ध्यान और आसन का प्रयोग किया गया। प्रारंभिक परिणाम बताते हैं कि नियमित योगाभ्यास से खिलाड़ियों की मानसिक एकाग्रता में सुधार हुआ और तनाव के स्तर में उल्लेखनीय कमी देखी गई। यह निष्कर्ष दर्शाता है कि योग न केवल शारीरिक स्वास्थ्य के लिए बल्कि खेल मानसिकता और प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए भी एक प्रभावी साधन है। KEYWORDS : योग, युवा खिलाड़ी, मानसिक एकाग्रता, तनाव नियंत्रण, ध्यान, प्राणायाम, खेल प्रदर्शन
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5.
आधुनिक भारत में STEM शिक्षा का बढ़ता चलन: अवसर, चुनौतियाँ और भविष्य की राह
राजीव कुमार & डॉ. घनेश कुमार
Page 33-37
 | Paper Titleआधुनिक भारत में STEM शिक्षा का बढ़ता चलन: अवसर, चुनौतियाँ और भविष्य की राहAbstract21वीं सदी में वैश्विक अर्थव्यवस्था और समाज पूरी तरह से प्रौद्योगिकी और नवाचार पर आधारित हो गए हैं। इस संदर्भ में STEM (Science, Technology, Engineering and Mathematics) शिक्षा एक अनिवार्य आवश्यकता के रूप में उभरी है। भारत, जो अपनी युवा जनसंख्या के लिए जाना जाता है, वर्तमान में STEM शिक्षा को अपनाने में एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रहा है। यह शोध पत्र भारत में STEM शिक्षा के बढ़ते चलन के कारणों, इसके महत्व, क्रियान्वयन में आने वाली बाधाओं और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP 2020) की भूमिका का विश्लेषण करता है। KEYWORDS : वैश्विक अर्थव्यवस्था, प्रौद्योगिकी, नवाचार, STEM, राष्ट्रीय शिक्षा नीति
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6.
FEMINIST VISION IN THE SELECTED NOVELS OF ANITA DESAI: A PSYCHOLOGICAL EXPLORATION OF FEMALE SUBJECTIVITY AND AGENCY
Charu Mathur & Dr. Neetu Yadav
Page 38-44
 | Paper TitleFEMINIST VISION IN THE SELECTED NOVELS OF ANITA DESAI: A PSYCHOLOGICAL EXPLORATION OF FEMALE SUBJECTIVITY AND AGENCYAbstractAnita Desai, a preeminent figure in Indian English literature, is renowned for her profound psychological realism and her intricate portrayal of the inner lives of her characters. While often categorized as a psychological novelist, this paper argues that Desai’s work also embodies a nuanced and deeply insightful feminist vision. Through a close examination of selected novels such as Cry, the Peacock (1963), Voices in the City (1965), Fire on the Mountain (1977), and Clear Light of Day (1980), this paper explores how Desai critically dissects patriarchal societal structures, challenges conventional gender roles, and foregrounds the struggles of women for identity, autonomy, and voice. Her feminist vision is not overtly polemical but rather a subtle yet powerful exploration of female subjectivity, alienation, and the desperate yearning for self-actualization within restrictive domestic and social spheres. This study analyzes how Desai\'s female protagonists confront the psychological burdens imposed by their gender, often seeking escape, solitude, or unconventional forms of agency, thereby offering a profound commentary on the female condition in post-colonial India. KEYWORDS : Preeminent, psychological realism, feminist vision, self-actualization, domestic and social spheres.
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7.
महिला सशक्तिकरण और राजनीतिक भागीदारी का सामाजिक प्रभाव
कुमुदनी कश्यप & जुल्फिकार
Page 45-53
 | Paper Titleमहिला सशक्तिकरण और राजनीतिक भागीदारी का सामाजिक प्रभावAbstractमहिला सशक्तिकरण और राजनीतिक भागीदारी किसी भी समाज के समग्र विकास और लोकतांत्रिक मजबूती के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण तत्व हैं। जब महिलाएं सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक रूप से सशक्त होती हैं, तो वे न केवल अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती हैं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने में भी सक्रिय भूमिका निभाती हैं। राजनीतिक भागीदारी के माध्यम से महिलाएं नीति-निर्माण प्रक्रिया में अपनी आवाज दर्ज कराती हैं, जिससे लैंगिक समानता, शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय से जुड़े मुद्दों पर अधिक प्रभावी निर्णय लिए जा सकते हैं।
महिला सशक्तिकरण का सामाजिक प्रभाव व्यापक होता है, जिसमें परिवार स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता में वृद्धि, शिक्षा और स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, तथा आर्थिक आत्मनिर्भरता शामिल है। वहीं, राजनीतिक भागीदारी से महिलाओं की नेतृत्व क्षमता विकसित होती है और समाज में उनकी स्थिति मजबूत होती है। यह प्रक्रिया पारंपरिक लैंगिक भेदभाव को चुनौती देती है और समान अवसरों की दिशा में मार्ग प्रशस्त करती है। महिला सशक्तिकरण और उनकी राजनीतिक भागीदारी समाज में समावेशी विकास, सामाजिक न्याय और लोकतांत्रिक मूल्यों को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। KEYWORDS : महिला सशक्तिकरण, राजनीतिक भागीदारी, सामाजिक प्रभाव, लैंगिक समानता, नेतृत्व
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